साक्षात्कार: सुब्रत गौतम

साक्षात्कार: सुब्रत गौतम

साक्षात्कार: सुब्रत गौतम

परिचय:
सुब्रत गौतम मूलतः बिहार के रहने वाले हैं। वह एक उभरते हुए फ़िल्मकार और फिल्म निर्देशक हैं। वे मुख्यतः भोजपुरी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों में निर्देशन के विभिन्न भूमिकाओं में काम करते हैं।

उनकी एक शोर्ट फिल्म:
भूतक किस्सा

चलचित्र-सेंट्रल ने सुब्रत गौतम के साथ एक छोटी सी बातचीत की है। यह बातचीत उनके जीवन, फिल्मो के प्रति उनके झुकाव और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर केन्द्रित है।

उम्मीद है यह बातचीत आपको पसंद आएगी।

प्रश्न: सुब्रत अपने बारे में बताइये? आप किधर से हैं? आपने शिक्षा कहाँ से प्राप्त की?

उत्तर: मेरा पूरा नाम सुब्रत गौतम है लेकिन अधिकतर लोग सुब्बू के नाम से बुलाते हैं, खास कर के अपने इंडस्ट्री में लोगों को सुब्बू ही सहज लगा। मैं मूल रूप से बिहार के मधेपुरा जिले से हूँ, लेकिन मेरा जन्म और 12वीं तक कि शिक्षा, दोनों पूर्णिया जिले में हुई और अब वही पारिवारिक निवास स्थान है। आगे मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्पेनिश भाषा में ऑनर्स डिग्री की पढ़ाई की लेकिन फाइनल ईयर के एक विषय की परीक्षा छोड़ दी, और दुबारा कभी मन भी नहीं हुआ।

प्रश्न: फ़िल्म लाइन में जाने का विचार कब आया? क्या इससे जुड़ा कोई कोर्स भी किया था?

उत्तर: स्कूल में एक्स्ट्रा करीकुलर एक्टिविटीज में,खास कर के नाटकों में, बहुत एक्टिव रहता था। वहीं एक दोस्त मिला फ़ैज़ी अनवर, जिसने बताया कि नाटक को कैमरा में रिकॉर्ड कर के फ़िल्म जैसा बना सकते हैं। इसी ने पहली बार इस क्षेत्र में कुछ करने के लिए प्रेरित किया। मेरा वो दोस्त तो परिवार की  नौकरी की ख्वाहिश की बलि चढ़ गया, लेकिन मैं किसी तरह फ़िल्म इंडस्ट्री में घिसते-घिसते आ ही गया।

इस क्षेत्र में कार्य करने के लिए मुझे मेरे कॉलेज एक सीनियर मनीष भैया, जो कि कलाकार दिमाग के थे, ने भी काफी प्रोत्साहित किया।

बाकी कोर्स तो मैं कोई कर नहीं पाया। हाँ, वर्कशॉप और सेमिनार, और बाकी गूगल और यूट्यूब दादा ने सिखाया।

प्रश्न: अपने कैरियर के शुरुआती समय के विषय में बताएं?

उत्तर: कॉलेज के बाद 6 महीने जॉब किया, फिर बेचैन हो कर इस्तीफा दिया और अपने बचत के पैसे से एक म्यूजिक वीडियो शूट किया। जान बूझ कर पैसे खर्च किये, क्योंकि मेनस्ट्रीम फ़िल्म इंडस्ट्री में किसी को जनता नहीं था, कहीं से एक मेकअप आर्टिस्ट सत्यवीर जी का संपर्क मिला, और उनके माध्यम से टीम जमा कर के म्यूजिक वीडियो शूट किया ताकि शूट के बहाने दूसरे लोगों वे मिल कर परिचय बढ़ाऊँगा। और फिर वैसे ही नेटवर्क बनता गया, और काम मिलने लगा। शुरुआती 3 साल बहुत बुरी आर्थिक स्थिति रही, लेकिन फिर धीरे धीरे अब काम बढ़ता ही जा रहा है।

प्रश्न: आप हिंदी और भोजपुरी दोनों भाषा में काम कर चुके हैं। इन इंडस्ट्रीज में आप क्या क्या मुख्य फर्क पाते हैं?

उत्तर: हिंदी औऱ भोजपुरी के अलावा, मैथिली, हरयाणवी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में भी कई सारे काम किये हैं। हाँ, चूँकि आपका सवाल हिंदी और भोजपुरी इंडस्ट्री के बीच के फ़र्क़ को लेकर है तो सबसे बड़ा फर्क जो मुझे लगता है वह इनके दर्शक वर्ग का है। हिंदी के पास हर वर्ग के दर्शक हैं, लेकिन भोजपुरी के पास भोजपुरीभाषियों में सेे भी कुछ ही वर्ग दर्शक के तौर पर उपलब्ध हैं।

दूसरा बड़ा फर्क है कि भोजपुरी फिल्मों में स्टार गायक ही स्टार अभिनेता होता है। उसकी एक बड़ी वजह है कि भोजपुरी फिल्मों का बजट काफी कम होता है। हिंदी के उलट, भोजपुरी में एक करोड़ भी बहुत बड़ा बजट माना जाता है, तो इसीलिए मार्केटिंग का बजट काफी कम होता है, और जो स्टार गायक है, उनके कई शो देश विदेश में होते ही रहते हैं, तो शो के माध्यम से मुफ्त की मार्केटिंग होती रहती है। पंजाबी इंडस्ट्री भी इसी फॉर्मूले पर काम करती हैं, हालांकि उनका बजट भी कम होता है लेकिन भोजपुरी से ज्यादा होता है।

प्रश्न: भोजपुरी सिनेमा का जब नाम आता है तो आम दर्शक के मन में एक ही तरह की छवि उभरती है। एक नये फिल्मकार होने के चलते आप इसे कैसे देखते हैं? इसमें क्या बदलाव होने चाईए?

उत्तर: इसका जवाब एक ही है, वो है कि बिहार में आरंभिक पढ़ाई अगर मातृभाषा में हो तो लोग भाषा से जुड़ेंगे। फिलहाल हालत ये है, कि आर्थिक रूप से मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग खुद को अलग दिखाने की होड़ में अपनी मातृभाषा से दूर हो गए हैं। तो अब जो वर्ग अपनी मातृभाषा से दूर नहीं हुआ है वो वर्ग शारीरिक रूप से मेहनत करता है और फ़िल्म को सस्ते मनोरंजन के तौर पर देखता है, तो उनके लिए ही फ़िल्म बनाई जाती है। जो वर्ग मीनिंगफुल सिनेमा में सर नहीं खपा सकता, वो वर्ग आपको मीनिंगफुल सिनेमा के पैसे नहीं देगा। बदलाव तभी आएगा जब लोग वापस अपनी भाषा से जुड़ेंगे, उसे गँवारों की भाषा समझ कर उपेक्षित नहीं करेंगे, और अगर शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो गया तो इस मानसिकता को ठीक करने की तरफ बेहतर कदम हो पायेगा। लेकिन ये कहते ही ये आरोप भी लग जाता है कि हम क्षेत्रवाद का महिमामंडन कर रहे हैं।

प्रश्न: आजकल बाहरी और भीतरी की बहस से फ़िल्म इंडस्ट्री जूझ रही है? आप भी फ़िल्म बैक ग्राउंड से नहीं आते हैं? आप इस बहस को कैसे देखते हैं? हिंदी और भोजपुरी सिनेमा के परिपेक्ष्य में इसे बताएं?


उत्तर:
हाँ, ये बात मैं मानता हूँ कि नेपोटिस्म है, लेकिन कहाँ नहीं है? मुझे फलाने डॉक्टर के यहाँ बिना नम्बर लगाए पहले चेक अप करवा लेने की सुविधा है क्योंकि वो मेरे पिताजी के दोस्त हैं… क्या ये नेपोटिस्म नहीं, उन दूसरे मरीजों की क्या गलती थी कि मेरे से पहले आ कर भी बाद में इलाज करवा पा रहे? आप  देखेंगे तो पाएंगे कि अपने अपने स्तर पर हर जगह हम सब कहीं न कहीं इसका इस्तेमाल करते ही हैं।

सुशांत सिंह राजपूत, के रहस्यमयी स्थिति में मृत्यु या कथित आत्महत्या के बाद से उपजे बहस के बारे में इतना तो जरूर कहूँगा कि बिना चिंगारी के धुआँ नहीं होता। और जहाँ तक सिनेमा में न्यू कमर की बात होती है तो सब दर्शकों के हाथ में है। अगर वो इतने ही संवेदनशील हैं फिल्मी दुनियाँ में नॉन फिल्मी बैकग्राउंड वाले आर्टिस्टों के संघर्ष से तो अगर वो नए लोगों का काम देखेंगे, प्रोत्साहन देंगे तो निश्चित ही मार्किट उनपर पैसा लगायेगी और वो आगे बढ़ेंगे।

प्रश्न: आजकल ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की भरमार है। दर्शकों के पास देखने को बहुत कुछ है। ऐसे में ott प्लेटफार्म से भोजपुरी सिनेमा का क्या भविष्य है? एक आम दर्शक इसमें क्या योगदान दे सकता है?
उत्तर: वही दर्शक वर्ग की बात है। अमेज़न और नेटफ्लिक्स जैसी बड़ी ओटीटी प्लेटफार्म भोजपुरी को यह  कह कर कई दफ़े बेरंग लौटा चुकी है कि उनके पास भोजपुरी का दर्शक वर्ग नहीं है। ऐसा तब है जबकि बिहार में हिंदी और अंग्रेज़ी वेब सीरीज का बहुत कंसम्पशन है। एकता कपूर ने ऑल्ट बालाजी के मार्फ़त कोशिश की लेकिन दोबारा कुछ न बन पाना दर्शाता है कि उन्हें दर्शक नहीं मिले। हालांकि अभी कुछ एक यूट्यूब चैनल कोशिश कर रहे हैं। राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त निर्देशक नितिन चंद्रा भी एक “बेजोड़” नाम से ओटीटी प्लेटफार्म बनाने के लिए क्राउड फंडिंग कर रहे हैं।

प्रश्न: कोरोना काल चल रहा है। फ़िल्म इंडस्ट्री भी इससे प्रभावित हो रही है। कई कलाकारों के अर्थिक संकट में घिरे होने की खबरे आती रहती हैं। आप इसे कैसे देखते हैं? आपके अनुभव क्या हैं?

उत्तर: समय वास्तव में मुश्किल है। फ़िल्म इंडस्ट्री बहुत ज्यादा प्रभावित हुई जिस पर ढंग से चर्चा भी नहीं हुई। संभवतः ये भी लोगों में एक नज़रिया होता है कि फ़िल्म वालों के पास बहुत पैसा होता है, जो कि सच है लेकिन कुछ प्रतिशत लोगों के लिए, जैसे कि हर इंडस्ट्री में है। हालांकि, प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन और डायरेक्टर एसोसिएशन ने अपने जरूरतमंद सदस्यों को आर्थिक रूप से और राशन से सहायता कर काफी सराहनीय काम किया है। जहाँ तक मेरी बात है तो जब एक दिन के लॉकडाउन की घोषणा हुई थी, तभी समझ गया था कि ये लंबा चलेगा और समय रहते गाँव पहुंच गया। गाँव में किसी तरह की परेशानी नहीं हुई।

प्रश्न: अपने आने वाले प्रोजेक्ट्स के विषय में बताएं। आने वाले समय में दर्शक आपके किन प्रोजेक्ट्स को देख सकते हैं?
उत्तर: अभी लॉकडाउन के बाद सपना नाम की एक भोजपुरी फ़िल्म शूट करनी है जिसमें मैं एसोसिएट डायरेक्टर के तौर पर काम करूँगा। इसके अलावा कुछ फ़िल्म फेस्टिवल्स के लिए शार्ट फिल्में बनाऊंगा। फिलहाल तो प्री प्रोडक्शन फेज में हैं।

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