दिलीप कुमार अपनी फिल्मों, अपने किरदारों की वजह से हमेशा ज़िंदा रहेंगे !

दिलीप कुमार अपनी फिल्मों, अपने किरदारों की वजह से हमेशा ज़िंदा रहेंगे !

कहा जाता है कि लेजेंड्स कभी मरते नहीं हैं वे अमर हो जाते हैं। भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के ट्रेजडी किंग मोहम्मद यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार भी अब इस दुनिया मे नहीं हैं, मगर उनकी फिल्में, उनकी यादें कयामत तक ज़िंदा रहेंगी।

मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूँ कि जज़्बात के उस शहंशाह से मुम्बई में मैं तीन बार मिल चुका हूँ। पहली बार मेरी उनसे मुलाकात मुम्बई में स्थित उनके बंगले पे हुई थी, जब सायरा बानो द्वारा निर्मित एक फ़िल्म का फंक्शन रखा गया था। मुम्बई के फाइव स्टार होटल जे डब्ल्यू मेरिएट में भी उनसे मुलाकात हुई और एक फिल्मी महफ़िल में उनसे मिला था। बतौर इंसान जो खूबियाँ उस सुपर स्टार में मौजूद थीं, वो अविश्वसनीय थीं।

दिलीप कुमार काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थे और आखिरकार 7 जुलाई 2021 को 98 साल की उम्र में उनका इन्तेक़ाल हो गया। भारतीय फिल्मों के इतिहास में सबसे अधिक दर्शकों को प्रभावित करने वाले अभिनेता दिलीप कुमार का केरियर 50 साल से अधिक का रहा लेकिन आपको जानकर हैरत होगी कि इतने वर्षों में उन्होंने महज 60 के करीब ही फिल्में की, लेकिन उनकी हर फिल्म अपने आप मे बेमिसाल रही। वह भी चाहते तो कई सौ फिल्मों में अभिनय कर सकते थे मगर उन्होंने क्वांटिटी से अधिक क्वालिटी पर तवज्जो दी और एक वक्त में एक ही फ़िल्म करने का चुनौतियों भरा फैसला लिया।

दिलीप कुमार ने स्वयं अपनी आत्मकथा में कहा है, ‘इसमें बेहद खतरा रहता है कि आप एक फिल्म में ही काम करें जबकि दूसरे एक्टर एक समय में दो या तीन फिल्में कर रहे होते थे। मैंने यह तय किया कि मैं एक समय में एक ही फिल्म करूँगा। यह सिर्फ अपने चुने हुए विषय के प्रति मेरा विश्वास होता था और वह मेहनत जो मैं उस रोल के लिए करता था।

दिलीप कुमार इंडियन सिनेमा वर्ल्ड  के ट्रेजेडी किंग और फर्स्ट सुपरस्टार के तौर पर जाने जाते हैं। पाँच दशक से भी लंबे समय के करियर में उन्होंने दर्जनों सुपरहिट फिल्में दी हैं। उन्होंने सन 1944 में आई फिल्म ‘ज्वार भाटा’ से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की, उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 22 साल थी। 1947 में रिलीज हुई फिल्म ‘जुगनू’  उनकी कामयाब फ़िल्म रही, जिसकी सफलता ने उन्हें जुगनू की तरह रौशन कर दिया। इसके बाद 1948 में शहीद और मेला भी उनकी हिट फिल्मों में शामिल रहीं। 1949 में रिलीज हुई महबूब खान की क्लासिक फिल्म अंदाज ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई जिसमें राज कपूर, दिलीप कुमार और नरगिस की तिकड़ी ने दर्शकों का दिल जीत लिया। इसके बाद तो दिलीप कुमार ने माइलस्टोन फिल्मों की जैसे लाइन लगा दी। तराना, संग दिल, अमर, इंसानियत, नया दौर, यहूदी, मधुमति, पैगाम, आन, मुगल-ए-आज़म, कोहिनूर, आज़ाद, लीडर, दाग , गोपी, राम और श्याम  जैसी अमर फिल्मों ने दिलीप कुमार को ट्रैजेडी किंग के रूप में स्थापित कर दिया।

1952 में रिलीज हुई फ़िल्म ‘दाग’ में दिलीप कुमार ने एक गरीब नवजवान शंकर का किरदार इतनी शिद्दत से निभाया था कि अपने करियर का पहला सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का अवार्ड हासिल किया था। मशहूर उपन्यासकार शरतचंद्र चटोपाध्याय के उपन्यास ‘देवदास’ पर आधारीत उनकी फिल्म देवदास 1955 मे रिलीज हुई। फिल्म में दिलीप कुमार ने देवदास के कैरेक्टर को जैसे जीवंत कर दिया था। देवदास हिंदी फिल्म जगत की कुछ बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती है। इस क्लासिक फ़िल्म ने दिलीप कुमार को सिनेमा जगत में एक वर्सटाइल एक्टर के रूप में पहचान दिलाई। बाद में संजय लीला भंसाली ने शाहरुख खान को लेकर देवदास बनाई वो भी सुपर हिट रही। दिलचस्प बात यह है कि शाहरुख खान और दिलीप कुमार के चेहरे, हेयर स्टाइल और डायलॉग डिलीवरी में काफी समानता पाई जाती है। कहा जाता है अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान ने कहीं न कहीं दिलीप कुमार से प्रेरणा हासिल की है।

बी. आर चोपड़ा द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘नया दौर’ भी दिलीप कुमार की चुनिंदा कामयाब फिल्मों में शुमार की जाती है। इस फिल्म में दिलीप कुमार ने शंकर नामक एक तांगेवाले का किरदार अदा किया जो बस के कारण तांगेवालों की रोजी रोटी खत्म होने के विरुद्ध आवाज उठाता है।


दिलीप कुमार का ज़िक्र हो और फ़िल्म ‘मुगल-ए-आजम’ का नाम न आए ऐसा सम्भव नहीं है। यह एक ऐतिहासिक फ़िल्म की हैसियत रखती है जिसकी लोग मिसाल देते हैं। 1960 में आई के. आसिफ द्वारा निर्देशित यह फिल्म भारतीय सिनेमा की ऐसी मूवी है जैसी फिर कभी नहीं बनाई जा सकी। फिल्म में दिलीप कुमार ने बादशाह अकबर के बेटे शहजादे सलीम की भूमिका निभाई थी जिन्हें अपने दरबार की एक कनीज नादिरा (मधुबाला) से मोहब्बत हो जाती है। दोनों की इस मोहब्बत को बादशाह अकबर अस्वीकार कर देते हैं। फिल्म में दिलीप कुमार ने जिस शिद्दत के साथ एक सच्चे आशिक का रोल निभाया है वह आज भी लाजवाब है। फ़िल्म के गाने, डायलॉग, सीन और दिलीप कुमार की अद्भुत एक्टिंग ने इस फ़िल्म को एक क्लासिक का दर्जा दे दिया।

दिलीप कुमार की यादगार फिल्मो में 1961 में रिलीज हुई फिल्म ‘कोहिनूर’ का नाम भी लिया जाता है जिसमें दिलीप कुमार की हिरोइन ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी हैं। दोनों ने राजकुमार और राजकुमारी के किरदार में जान डाल दी।  फिल्म में दिलीप कुमार तलवारबाजी करते हुए भी नजर आए।

दिलीप कुमार का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे ज्यादा अवार्ड्स जीतने वाले किसी इंडियन एक्टर के रूप में भी दर्ज है। उनके नाम बेस्ट ऎक्टर के सबसे ज्यादा फिल्मफेयर पुरस्कार भी हैं।

दिलीप कुमार की डायलॉग डिलीवरी की लोग आज भी मिसाल देते हैं। उन्हें लैंगुएज और लफ़्ज़ों के उच्चारण पर कमाल का तजुर्बा हासिल था और उसकी वजह यह थी कि वह खूब पढ़ते थे। किताबों के शौकीन दिलीप कुमार अपने फुर्सत के लम्हों में बेपनाह पढ़ा करते थे। किताब “दिलीप कुमार-वजूद और परछाई”  में उनकी पत्नी और ऎक्ट्रेस सायरा बानो ने लिखा है-

‘शब्दों और भाषा के ऊपर उनकी जबरदस्त पकड़ है चाहे अंग्रेज़ी हो या उर्दू…उनके बेशुमार चाहने वालों में कुछ ही लोग जानते हैं कि दिलीप कुमार बहुत बड़े पढ़ाकू थे. चाहे वह कोई नॉवेल हो, चाहे नाटक या जीवनी, क्लासिक साहित्य के लिए उनका प्यार सबसे बढ़कर था।’

लेखक दिलीप कुमार के साथ

About गाज़ी मोईन

गाजी मोईन मुंबई में काफ़ी समय से फ़िल्मी दुनिया में बतौर गीतकार, राईटर और फ़िल्म जर्नलिस्ट एक्टिव हैं। वह कवि भी हैं और आप मुंबई सहित देश भर के कई कवि सम्मेलनों और मुशायरों में अपनी शायरी पेश करते आए हैं। ऑल इंडिया रेडियो मुम्बई पर नियमित रूप से वह अपनी रचनाएं पेश करते आए हैं। म्यूज़िक एलबम "तू ही तो था" और "शब" के लिए लिखे हुए उनके गीत काफी मक़बूल हुए हैं। सिंगर रूप कुमार राठौड़ और ग़ज़ल सिंगर सोनाली राठौड़ की आवाज़ में उनके गीत और ग़ज़लें रिकॉर्ड हैं जिन्हें रेडियो मिर्ची से प्रसारित किया गया। गाज़ी मोईन ने दूरदर्शन के कई सीरियल्स लिखे हैं, कई म्यूज़िक चैनल से जुड़े रहे हैं और फ्रीलांसर के रूप में कई अख़बारों, मैगज़ीन के लिए लिखते रहे हैं। गाज़ी मोईन मुंबई में द इंडियन परफॉर्मिंग राईट सोसाइटी लिमिटेड के मेंबर भी हैं। गाज़ी मोईन को उनके योगदान के लिए "सिनेमा आजतक अचीवमेंट अवॉर्ड" सहित कई पुरूस्कार और सम्मानों से भी नवाजा जा चुका है। इनकी 2 पुस्तकें पब्लिश हो चुकी हैं।

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